Hindi Poem On LifePoem

पता ही न चला

Childhood Memories

कब उंगली पकडे पकडे
हाथ छोड़ कर भागने लगा
पता ही न चला

कब जिंदगी को सुलझाते सुलझाते
खुद उलझ गया
पता ही न चला

रिस्ते बहुत नाजुक थे
उन्हें जीवन भर एक डोर में भांदे रखना था
कब वो डोर कमजोर पड़ गई
पता ही न चला

Childhood Memories
Childhood Memories

दूसरों को पहचानते पहचानते
कब खुद को भूल गए
पता ही न चला

ये जीवन था बड़ा प्यारा
जब एक उंगली से हाथ पकड़ा था
ये जीवन था बड़ा प्यारा
जब एक कदम से दौरना सीखा था
ये जीवन था बड़ा प्यारा
ये प्यारा जीवन
कब साथ छोड़ गया
पता ही न चला

कब उंगली पकडे पकडे
हाथ छोड़ कर भागने लगा
पता ही न चला

ये जीवन की कुछ कमाई थी
न जाने किस किस दोर से होकर कमाई थी
सारी कमाई छूट गई
कब वो मोड़ आया
पता ही न चला

कब जिंदगी को सुलझाते सुलझाते
खुद उलझ गया
पता ही न चला

कब उंगली पकडे पकडे
हाथ छोड़ कर भागने लगा
पता ही न चला

Image by engin akyurt from Pixabay

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Ankit Garg
Ankit Garg
1 year ago

Nice poem

Ritesh Jindal
1 year ago

Thank you ankit

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