Ek Pahel Bagi KiKahaniyon Ka Sansar Season 1Short Story

एक पहल बागी की पार्ट 1

ek pahel bagi ki part 1

सबको हँसाने वाला लड़का आज थोड़ा शांत सा बैठा था। ये पहेली बार हो रहा था।
ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो तेज हवा थम सी गई हो।
राजेश के पास कोई चहल-पहल ही नहीं थी। मानो जैसे चिड़ियों ने चहकना बंद कर दिया हो। भरी सभा में जोर-शोर के बीच जैसे मानो राजेश की दुनिया कही और ही थी।
राजेश थोड़ा सा परेशान था और थोड़ा सा उदास भी।
“ये क्या! राजेश तो रो रहा है।”
“क्या हुआ?” उसकी मैम अंगूरी ने राजेश से बड़ी हैरानी से पूछा।
“क………… कुछ नहीं।” राजेश की आवाज साफ-साफ बता रही थी की वो रो रहा था।
“तुम रो रहे हो राजेश, मुझे बताओ क्या हुआ?” राजेश की मैम परेशान थी और जानने की कोशिश कर रही थी कि राजेश रो क्यों रहा है।
“तुम रो रहे हो, राजेश मुझे बताओ क्या हुआ है?”
राजेश अपनी मैम अंगूरी की तरफ देखता है और जोर-जोर से रोने लगता है।
“तुम पहले अपने आँसूं पोछो, पानी पियो और शांत हो जाओ।यहाँ बैठो, बताओ मुझे, क्या हुआ?”
काफी देर बाद राजेश शांत हुआ। उसने अपनी मैम अंगूरी की तरफ देखा और कुछ न बोला।
राजेश को आज कोई अपना मिल गया था। वह अपनी सारी बात अपनी मैम को बताना चाहता था।
मैम राजेश के पास आई और राजेश से प्यार से पूछा

 

“क्या हुआ राजेश , क्यों परेशान हो? घर पर कोई बात; पापा ने कुछ कहा?”
राजेश अपनी मैम अंगूरी को अक्सर अपने बारे में बताता रहता था।
राजेश शांत था। उसने कुछ नहीं बोला।
“राजेश परेशान मत हो , सब ठीक हो जायेगा।”

ek pahel bagi ki part 1

“मैंने घर छोड़ दिया है।” काफी देर बाद राजेश ने बड़े हलके से बोला।
“क्या! क्या कहा तुमने।”
“जी मैम, मैंने घर छोड़ दिया है।”
“पर क्यों? क्या हुआ ऐसा।”
“बस मैम , आप सब जानती हो, मैंने छोड़ दिया है।”
“अब क्या करोगे, कहाँ रहोगे, क्या सोचा है?” मैम ने एक साथ कई सवाल पूछ लिए थे। मैम परेशान थी और चिंतित भी थी। ये उनके चहरे से साफ नजर आ रहा था।
“कहाँ रहोगे राजेश?”
“पता नहीं मैम।” राजेश के पास कोई शब्द नहीं थे।
“राजेश तुम एक काम करो, तुम यहीं मेरे यहाँ रुक जाओ, जब तक चाहो।”
“पर…………..।”
“पर क्या राजेश, मैं तुम्हारी मैम, तुम्हारी बड़ी बहन जैसी हूँ, यहीं रुक जाओ।”
“नहीं मैम”
“नहीं-वहीँ कुछ नहीं तुम यहीं रुक जाओ, मेरा कोई भाई भी नहीं है।” इतना बोलते ही मैम की आँखों में आँसूं छलक गए।
“राजेश तुम कहाँ जाओगे, यहीं रुक जाओ।” मैम की ऑंखें नम थी।
“ठीक है, पर जैसे ही कोई वयवस्था हो जायेगी मैं चला जाऊंगा।”
मैम ने राजेश को कस कर गले लगा लिया।
मैम आज बहुत खुश थी। अंगूरी दौड़ कर अंदर गई और अंदर से आरती की थाली ले आई। थाली में रक्षा धागा भी था।
“पर मैम, आज तो रक्षा बंधन नहीं है।” राजेश ने हैरानी से पूछा।
“जिस दिन मेरा भाई मिल गया वही दिन मेरे लिए रक्षा बंधन है।”
“तुम मेरे साथ चलो।” अंगूरी , राजेश को मंदिर ले गई।
आज अंगूरी बहुत खुश थी। आज अंगूरी की तपसया पूरी हो गई थी।
“तुम बैठो , में तुम्हारे लिए कुछ खाने के लिए लाती हूँ। तुमने सुबह से कुछ नहीं खाया होगा।”
“खाने के बाद हम खूब सारी बातें करेंगे। मुझे बहुत सारी बातें करनी है तुमसे।”
अंगूरी रसोई में जाती है लेकिन रसोई में तो कुछ भी नहीं है।
ये बात राजेश को मालूम थी। राजेश के पास कुछ रूपये थे वो पास रखी मेज पर रख देता है।
“मैं ज़रा बाहर जाकर कुछ लाती हूँ।”
“अरे, पैसे तो ले जाओ।”
“नहीं, है मेरे पास।”
“कहाँ है, पैसे तो यहाँ मेज पर रखे है।” अंगूरी समझ गई थी कि ये राजेश ने रखे है।
“मैं ये कैसे ले सकती हूँ।”
“मैम, आपने मुझे भाई बोला है न, तो ये आपको लेने होंगे।”
ऐसे ही राजेश और अंगूरी ख़ुशी-ख़ुशी साथ रहने लगे। कभी अंगूरी, राजेश को डांटती कभी उसे प्यार करती। अंगूरी और राजेश , दोनों साथ स्कूल भी जाते। दोनों एक दूसरे के साथ ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे। देखते-ही-देखते राजेश का बारहवीं की पढ़ाई भी पूरी हो चुकी थी।
“तुम आगे क्या करोगे राजेश?”
“मैं मैम , b.sc करूँगा।”
अंगूरी के पास राजेश की आगे की पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे। अंगूरी परेशान सी रहने लगी, पर उसने कभी राजेश को कमी महसूस नहीं होने दिया।
अंगूरी देर रात तक बच्चों को पढ़ाने लगी। अंगूरी चाहती थी कि राजेश की पढ़ाई न रुके।
अंगूरी ने अपना ख्याल ही नहीं रखा और कड़ी मेहनत करती रही , इसी वजह से अंगूरी बीमार पढ़ गई।
“जा 50000 ले आ, तेरी बहन का इलाज हो जायेगा।”
“पर , मैं कहाँ से लाऊंगा।”
“वो तू देख, अगर तुझे अपनी दीदी का इलाज करवाना है तो कल तक 50000 जमा करवा दे।”
राजेश की ऑंखें नम सी थी, वो अंगूरी के पास बैठा रो रहा था।
“क्या हुआ राजेश, मत रो, मैं ठीक हूँ। तू परेशान मत हो।”
“क्यों परेशान न हूँ दीदी।” राजेश , अंगूरी की गोद में सर रख कर रोने लगा।
रात हो चुकी थी, वह अंगूरी को घर ले आया था। राजेश को पैसे इकठा करने थे। इस चिंता में वो पूरी रात नहीं सोया।
सुबह अंगूरी का ऑपरेशन सफल होता है। अंगूरी जैसे ही अपनी ऑंखें खोलती है।
“राजेश………….. राजेश कहाँ है?”
वो पुरे अस्पताल में दौड़ती है , चीखती है, चिल्लाती है।
“राजेश , कहाँ हो तुम?”
“तुमने राजेश को देखा”
“अंगूरी बैठो इधर, परेशान मत हो, मेरी बात सुनो।”
“पर राजेश कहाँ गया डॉक्टर साहब, मेरा भाई कहाँ है?” अंगूरी आशावादी नजरों से डॉक्टर की तरफ देखती है।
“तुम्हारा भाई सुबह एक आदमी के साथ तुम्हें लेकर आया था। तुम बेहोश थी, इसलिए तुम्हें नहीं पता।”
“एक आदमी!” अंगूरी ने बड़ी हैरानी से कहा।
“कोन था वो आदमी?”
“पता नहीं, पर तुम्हारा भाई बहुत उदास था। उसने मुझसे कहा मेरी बहन को कहना मैं अपने घर जा रहा हूँ और बहुत जल्द वापस आऊंगा, तब तक मेरी दीदी का ख्याल रखना।”
“वो अभी तक यहीं था, तुम्हें होश आते ही निकला है। शायद अभी बाहर तक ही पहुँचा होगा।”
अंगूरी नगें पाव ही दौड़ पड़ी। उसकी खुशी कोई अपने साथ लेकर जा रहा था।
“राजेश, राजेश!” अंगूरी ने जोर-जोर से आवाज लगाई पर राजेश तब तक जा चूका था।
अंगूरी रोती हुई अपनी और अपने भाई की यादें लेकर जा ही रही थी कि फ़ोन पर एक मैसेज आता है।
“दीदी, मैं वापस जरूर आऊंगा तब तक अपना ख्याल रखना।”

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